Gold Price: ₹1 लाख पर पहुंचा सोना, म्युचुअल फंड निवेशक क्या करें? Gold ETF और फंड में बढ़ाएं या घटाएं निवेश – gold price reached rs 1 lakh should you buy or sell know what should be your future strategy

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Gold Price at ₹1 Lakh: हाल ही में पीली धातु (सोना) ₹1 लाख के स्तर को छू चुकी है, जिससे इसके सबसे बड़े समर्थक भी दुविधा में हैं—क्या निवेश जारी रखें या अब बेचकर मुनाफा कमा लेना चाहिए? एक्सपर्ट्स का मानना है कि सोने के दाम किस दिशा में जाएंगे, इसका अनुमान लगाने के बजाय निवेशकों को अपनी एसेट एलोकेशन स्ट्रैटेजी के अनुसार फैसला लेना चाहिए।

सोने की कीमतों में तेजी की वजह

नीतिगत अनिश्चितता

इस समय सोने में चल रही तेजी की सबसे बड़ी वजह नीतिगत अनिश्चितता है। क्वांटम एसेट मैनेजमेंट कंपनी के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर चिराग मेहता कहते हैं, “टैरिफ लगाना और मौजूदा बातचीत की प्रक्रिया एक तरह से पुराने वर्ल्ड ऑर्डर को बदलने की कोशिश है। जो तेजी से बदलाव हो रहे हैं, उन्होंने काफी अनिश्चितता पैदा कर दी है।”

अमेरिका की नीति निर्माण प्रक्रिया से विश्वास की कमी आई है, जिससे अमेरिकी डॉलर में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में तय होती है, इसलिए डॉलर के कमजोर होने से सोने की कीमत को सपोर्ट मिलता है।

राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की प्रस्तावित व्यापार नीतियों में बदलाव से अमेरिका में स्टैगफ्लेशन आ सकता है—यानि ऊंची महंगाई और धीमी ग्रोथ का दौर। मेहता कहते हैं, “ऐसे माहौल में लोग रिस्की एसेट्स से दूरी बनाते हैं और ऐसे एसेट क्लास की ओर रुख करते हैं जो उनकी वैल्यू को बचा सके।”

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निवेश की मांग में भी बढ़ोतरी

निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड में कमोडिटीज हेड और फंड मैनेजर विक्रम धवन का कहना है कि 2025 में सोने का प्रदर्शन अच्छा रहा। इसकी वजह यह है कि निवेशकों ने एक बार फिर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) में पैसा लगाना शुरू कर दिया है।

सेंटरल बैंकों की खरीदारी भी बड़ा फैक्टर

टाटा एसेट मैनेजमेंट की प्रोडक्ट हेड शाइली गांग कहती हैं, “रूस, चीन और भारत जैसे देशों ने अपनी विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा बढ़ाया है, जो कीमतों को सपोर्ट देने में अहम भूमिका निभा रहा है।”

सोने के लिए नेगेटिव फैक्टर

इस तेजी को खत्म करने वाला एक बड़ा कारण ट्रेड से जुड़ी आर्थिक अनिश्चितता का समाधान हो सकता है। मेहता कहते हैं, “अगर ऐसा होता है, तो सोने की कीमत में जो आर्थिक अनिश्चितता का प्रीमियम जुड़ा हुआ है, वह खत्म हो सकता है जिससे कीमतों में गिरावट आ सकती है।” शाइली गांग का मानना है कि अगर अमेरिका टैरिफ बातचीत में नरम रुख अपनाता है, तो डॉलर स्थिर हो सकता है जिससे सोने की तेजी पर ब्रेक लग सकता है।

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चीन और भारत मिलकर ग्लोबल फिजिकल गोल्ड डिमांड का लगभग 50% हिस्सा रखते हैं, जो मुख्य रूप से ज्वेलरी की मांग से जुड़ा है। धवन कहते हैं कि अगर सोने के दाम बहुत ज्यादा बढ़ते हैं, तो लोग कम मात्रा में सोना खरीद सकते हैं। इससे टन में सोने की खपत घट सकती है, भले ही कुल खर्च उतना ही रहे।

अगर टैरिफ वॉर और बिगड़ता है, तो इसका असर शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है। शाइली गांग कहती हैं, “शेयर बाजार में मार्जिन कॉल आने पर कुछ निवेशक अपने इक्विटी निवेश की रक्षा के लिए सोना बेच सकते हैं। इस तरह की बिकवाली सोने की तेजी पर असर डाल सकती है।”

सोने की कीमतों को लेकर पॉजिटिव उम्मीदें

आने वाले एक साल में सोने की कीमतें किस दिशा में जाएंगी, यह काफी हद तक टैरिफ से जुड़ी बातचीत के नतीजों पर निर्भर करेगा। धवन कहते हैं, “अगर ट्रेड वॉर और बिगड़ता है, तो यह सोने को सपोर्ट देगा। दूसरी ओर, अगर अमेरिका सभी टैरिफ पूरी तरह हटा देता है, तो सोने में जो रिस्क प्रीमियम जुड़ा है, वह खत्म हो सकता है। अगर ग्लोबल स्थिति जैसी है वैसी ही बनी रहती है और अमेरिका कई देशों के साथ ट्रेड डील की बातचीत जारी रखता है, तो यह सोने के लिए मॉडरेट रूप से पॉजिटिव होगा।”

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मेहता को आने वाले साल में बाजार में काफी उतार-चढ़ाव की उम्मीद है। जिससे सोने की कीमतों में तेज बढ़त और गिरावट दोनों देखने को मिल सकती हैं। फिर भी वे सोने को लेकर लंबे समय के लिए सकारात्मक हैं। वे कहते हैं, “ट्रंप प्रशासन की नीतियों के कारण जो भरोसे की कमी पैदा हुई है, उसकी वजह से केंद्रीय बैंक अपने रिजर्व में डाइवर्सिफिकेशन की ओर बढ़ेंगे। यह ट्रेंड लंबे समय तक बना रहेगा।” मेहता ने आगे कहा कि बढ़ते फिस्कल डेफिसिट और अस्थिर कर्ज का खतरा भी बना हुआ है। अगर ग्रोथ में अचानक गिरावट आती है और केंद्रीय बैंक नीतियों में नरमी लाते हैं, तो वह स्थिति भी सोने के पक्ष में जाएगी।

सोना खरीदें या बेचें?

वर्तमान कीमतों पर सोना खरीदना या बेचना चाहिए, इसका फैसला निवेशकों को अपने एसेट एलोकेशन के आधार पर करना चाहिए। मेहता कहते हैं, “सोने में 10–15% का निवेश आदर्श माना जाता है। अगर आपका निवेश इससे कम है, जैसा कि ज्यादातर निवेशकों के साथ होता है, तो अगले छह महीनों में थोड़ा और सोना खरीदें ताकि आप अपनी आदर्श एसेट एलोकेशन तक पहुंच सकें।” अगर हाल की कीमतों में तेजी के कारण सोने में आपका निवेश तय सीमा से ज्यादा हो गया है, तो मुनाफा बुक करने और पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करने पर विचार करें।

सेबी में रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार और सहजमनी.कॉम के फाउंडर अभिषेक कुमार भी मानते हैं कि अगर किसी निवेशक को पैसों की जरूरत है या वह अपना पोर्टफोलियो संतुलित करना चाहता है, तो वह सोना बेच सकता है। वह कहते हैं कि निवेश से जुड़ा फैसला हमेशा निवेशक के वित्तीय लक्ष्यों, जोखिम सहने की क्षमता और पोर्टफोलियो में पहले से मौजूद सोने की मात्रा के आधार पर होना चाहिए।

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सरकार ने जब से सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) की नई किस्तें जारी करना बंद किया है, निवेशक अब ETF या फंड-ऑफ-फंड के जरिए सोने में निवेश पर विचार कर सकते हैं। मिरे असेट इनवेस्टमेंट मैनेजर्स (इंडिया) के ETF प्रोडक्ट हेड और फंड मैनेजर सिद्धार्थ श्रीवास्तव कहते हैं, “ETF में प्योरिटी का कोई रिस्क नहीं होता, क्योंकि नियमों के तहत फंड हाउसों को 995-प्योरिटी वाले लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन (LBMA) सर्टिफाइड गोल्ड में ही निवेश करना होता है। इसमें निवेशकों को स्टोरेज की चिंता नहीं होती, वे एक्सचेंज पर दिनभर के किसी भी समय सोना खरीद और बेच सकते हैं। इसके अलावा ज्वेलरी की तरह मेकिंग चार्ज भी नहीं देना पड़ता और छोटे अमाउंट से भी निवेश शुरू किया जा सकता है।”

आज कई फंड हाउस गोल्ड ETF पेश कर रहे हैं, ऐसे में निवेशकों को फंड चुनते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। कुमार कहते हैं, “ऐसा फंड चुनें जिसका खर्च अनुपात (expense ratio) कम हो, ट्रैकिंग एरर बहुत कम हो, लिक्विडिटी ज्यादा हो और फंड का आकार बड़ा हो।”


First Published – April 25, 2025 | 9:54 AM IST



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