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पिछले साल में कई बार टलने के बाद भारतीय बाजार इस हफ्ते कॉमन कॉन्ट्रैक्ट नोट की व्यवस्था लागू करने जा रहा है। इस कदम से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों और अन्य संस्थागत प्रतिभागियों को फायदा मिलने की उम्मीद है और इसे ट्रेड सेटलमेंट को व्यवस्थित करने के तौर पर देखा जा रहा है। कॉन्ट्रैक्ट नोट में लेनदेन का औपचारिक रिकॉर्ड होता है। उसमें शेयरों की संख्या, कीमत, ब्रोकरेज शुल्क, कर और अन्य जरूरी सूचनाएं होती हैं। अभी ब्रोकर हर एक्सचेंज के लिए अलग-अलग अनुबंध जारी करते हैं, भले ही वह समान ऑर्डर हो। इससे अक्सर कीमतों में फर्क हो जाता है।
नई प्रणाली के तहत बीएसई और एनएसई दोनों में निष्पादित ऑर्डरों के लिए एकल भारित औसत मूल्य (डब्ल्यूएपी) की गणना की जाएगी जिसमें ब्रोकर एक इकट्ठा अनुबंध नोट जारी करेंगे। बाजार के प्रतिभागियों ने बताया कि एकल इलेक्ट्रॉनिक अनुबंध नोट न होने से पहले एफपीआई केवल एक एक्सचेंज पर ही ट्रेडिंग कर पाते थे, भले ही दूसरे पर बेहतर कीमत मिल रही हो।
बाजार के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, संस्थाएं अपने ऑर्डर के लिए सर्वोत्तम भाव और बेहतर निष्पादन सुनिश्चित करने में असमर्थ रहती थीं। कॉमन कॉन्ट्रेक्ट नोट के लिए मुख्य रूप से एफपीआई ने जोर दिया था। इस बदलाव से एक्सचेंजों के बीच आपसी संचालन क्षमता में और इजाफे की उम्मीद है।
हालांकि इस व्यवस्था की घोषणा पहली बार मई 2024 में की गई थी। लेकिन इसके अमल में कई बार देर हुई। पहले इसे अगस्त 2024, फिर जनवरी 2025 तक और बाद में मार्च 2025 किया गया। सूत्रों ने संकेत दिया है कि व्यापक मॉक ट्रेडिंग सत्रों और उद्योगव्यापी तैयारियों के बाद यह प्रणाली अब शुरू होने के लिए तैयार है। हालांकि कई लोगों ने इस बदलाव के लिए परेशानी वाले मसलों और परिचालन लागत और जटिलता के बारे में बताया है।
पिछले तीन हफ्तों में स्टॉक एक्सचेंजों, क्लियरिंग कॉरपोरेशनों और बाजार के प्रतिभागियों ने कई परीक्षण किए हैं। इनमें अकेले इस महीने उपयोगकर्ता स्वीकृति परीक्षण (यूएटी) के 10 दौर शामिल हैं। अब तक, एनएसई क्लियरिंग के तहत नौ कस्टोडियन और बीएसई के इंडियन क्लियरिंग कॉरपोरेशन (आईसीसीएल) के तहत दो कस्टोडियन ने अपनी तैयारी की पुष्टि की है। कस्टोडियन एफपीआई और संस्थागत ट्रेडों को उनकी प्रतिभूतियों और फंडों को होल्ड करके सहज बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
कुछ बाजार प्रतिभागियों ने संभावित समस्याओं को लेकर चेतावनी दी है, विशेष रूप से इस बात के कारण कि एक्सचेंज सीधे-सीधे प्रोसेसिंग (एसटीपी) के माध्यम से सौदों की वैल्यू की रिपोर्ट कैसे करते हैं। एसटीपी लेनदेन के प्रोसेसिंग के लिए स्वचालित प्रणाली है।
एक प्रतिभागी ने बताया, एनएसई दो दशमलव स्थानों में सौदे की वैल्यू की जानकारी देता है। लेकिन बीएसई एसटीपी फाइलों में चार दशमलव स्थानों का उपयोग करता है। इस अंतर के कारण हैंड डिलिवरी ट्रेड में इजाफा हो सकता है, जिसके लिए मैन्युअल ब्रोकर हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। सूचकांक पुनर्संतुलन जैसे ज्यादा वॉल्यूम वाले दिनों को लेकर भी चिंताएं हैं जहां अंतर का ज्यादा असर हो सकता है।
इसके अलावा कुछ कस्टोडियन ने संकेत दिया है कि नई प्रणाली को अपनाने के लिए बड़े मूलभूत बजलावों की जरूरत हो सकती है और इसमें खासी लागत आ सकती है। एक अन्य प्रतिभागी ने कहा, एफपीआई वर्तमान प्रक्रिया से अच्छी तरह वाकिफ हैं और इस बदलाव से मौजूदा स्थिति में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं होगा।
First Published – April 29, 2025 | 11:15 PM IST
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